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एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदान के लिए अधिग्रहित की जाने वाली जमीन में रोड़ा
कोरबा . एशिया की सबसे बड़ी गेवरा कोयला खदान पर गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ के कोरबा स्थित इस खदान के विस्तार के लिए अधिग्रहित की गई जमीन का आधिपत्य अब तक एसईसीएल को नहीं मिला है।

अभी जिस जमीन पर खनन कार्य जारी है, वहां कोयले का भंडार लगातार कम होता जा रहा है। ऐसे में अगर जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला तो अप्रैल से गेवरा खदान बंद हो जाएगी। इससे देश में बड़ा बिजली संकट भी खड़ा हो जाएगा। इस खदान के कोयले से छत्तीसगढ़ सहित 6 राज्यों के पावर प्लांट संचालित हो रहे हैं।

एसईसीएल के गेवरा क्षेत्र के अंतर्गत इस खदान के लिए 4184 हेक्टेयर (10,711 एकड़) जमीन की जरूरत थी, जिसमें से 3046 हेक्टेयर (7797 एकड़) जमीन एसईसीएल को मिल चुकी है। शेष 1137 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण तो हो चुका है, पर इसका आधिपत्य अब तक एसईसीएल को नहीं मिला है।

यह जमीन कटघोरा ब्लॉक के अमगांव, रलिया, पोंडी, बाहनपाठ, भठोरा, भिलाईबाजार, नरईबोध व गेवरा गावों की है। अभी जिस जमीन पर कोयला खनन चालू है वहां 1 अप्रैल 2012 को 45 मिलियन टन कोयले का भंडार शेष बचा था। इसमें से अब तक 18 मिलियन टन कोयला निकाला जा चुका है। खदान की वार्षिक उत्पादन क्षमता 35 मिलियन टन है।

इस दृष्टि से वित्तीय वर्ष की समाप्ति 31 मार्च 2013 तक यहां से इस वर्ष का शेष बचा 17 मिलियन टन कोयला भी निकल जाएगा तब खदान में 1 अप्रैल 2013 की स्थिति में 10 मिलियन टन कोयला ही बचेगा। स्पष्ट है कि जमीन न मिलने पर खनन कार्य रूक जाएगा।

पोंडी और अमगांव सबसे जरूरी

एसईसीएल गेवरा क्षेत्र का उत्पादन जारी रखने के लिए सर्वाधिक आवश्यक जमीन का हिस्सा अभी खदान क्षेत्र से सटे हुए ग्राम पोंडी व अमगांव का है। पोंडी में 361 एकड़ व अमगांव में 608 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई है। यहां क्रमश: 125 व 175 मिलियन टन कोयले का भंडार है।

इन दोनों गांवों के बीच 100 हेक्टेयर (लगभग 256 एकड़) वनभूमि स्थित है। जहां 100 मिलियन टन कोयला है, पर वनभूमि में जाने के लिए इन दोनों गांवों के बीच का मुहाना काफी संकरा है। इस कारण वहां भी उत्पादन करना संभव नहीं हो पा रहा है। इन दोनों गांवों की जमीन मिल जाने पर 35 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता से यह खदान अगले 12 वर्ष तक कोयला दे सकती है।

पड़ने लगा खनन पर असर

एसईसीएल गेवरा क्षेत्र के मुख्य महाप्रबंधक आरबी शुक्ला ने बताया कि जमीन न मिलने का असर खनन कार्य पर पड़ने लगा है। कोयला निकालने से पहले हटाए जाने वाले मिट्टी व पत्थर (ओवर बर्डन) की मात्रा उस गति से नहीं निकाली जा पा रही है, जितनी की होनी चाहिए। मार्च तक यदि जमीन नहीं मिली तो अप्रैल माह से खदान बंद करने की स्थिति बन जाएगी।

भू-विस्थापितों के लिए जो पैकेज राज्य शासन व कोल इंडिया बोर्ड की सहमति से तैयार किया गया वह बेहतर है। इससे पहले ऐसा पैकेज नहीं दिया गया। ग्रामीणों ने भी अपनी सहमति देते हुए इसे स्वीकार कर उनकी जमीन का आधिपत्य हमें देना शुरू कर दिया है किन्तु इसकी गति बहुत धीमी है। गेवरा क्षेत्र में कोयले का शेष बचा कुल भंडार 781 मिलियन टन आंका गया है।

यानी खदान के लिए जरूरी सारी जमीन मिल जाने पर इस इसकी आयु 35 मिलियन टन वार्षिक खनन के हिसाब से 22 वर्ष की हो जाएगी।

जमीन को लेकर क्या है समस्या

गेवरा खदान के विस्तार के लिए अधिग्रहित सात गांवों की जमीन के सभी खातेदार चाहे फिर उनकी जमीन एक डिसमिल ही क्यों न हो नौकरी की मांग कर रहे हैं। इस मामले में यही सबसे बड़ी समस्या है। जिला पुनर्वास समिति द्वारा स्वीकृत कोल इंडिया की पॉलिसी के अनुसार 2 एकड़ जमीन पर एक को नौकरी जमीन के रकबे के घटते हुए क्रम में दी जानी है।

पोंडी गांव की 360 एकड़ जमीन के 1453 खातेदार हैं, जबकि पॉलिसी के अनुसार केवल 180 को ही नौकरी मिलेगी। एक अधिकारी का कहना है कि नौकरी की लालच में ही इस गांव में अनेक लोगों ने जमीन खरीदी थी। अब यही लोग विरोध में आ गए हैं।

छह राज्यों के पावर प्लांट होंगे प्रभावित

गेवरा खदान से छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र व पंजाब के पावर प्लांट, सीमेंट, स्पंज आयरन सहित अन्य उद्योगों को कोयला आपूर्ति होती है। यदि यह कोयला खदान बंद हो गया तो इन सभी उद्योगों पर सीधा असर होगा।
17-11-2012
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